अल्फाबेटिकल पेरेंटिंग - कॅरेन क्लेअर
- Ananya Ahuja
- 1 day ago
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पालन-पोषण की सोच को नए सिरे से देखने वाली किताब
क्या आपने कभी यह सोचा है कि अगर आपके माता-पिता ने कुछ बातें अलग तरीके से की होतीं, तो शायद आप आज थोड़े अलग इंसान होते?यही सवाल इस पुस्तक की आत्मा है। यह किताब पारंपरिक परवरिश के नियमों को तोड़कर, माता-पिता को सोचने, ठहरने और समझने का अवसर देती है। यह न तो सही-गलत की सूची देती है, न ही परफेक्ट पेरेंट बनने का दबाव डालती है—बल्कि एक मानवीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।
यह पुस्तक इस विचार को सामने रखती है कि बच्चों का पालन-पोषण नियंत्रण से नहीं, बल्कि समझ और संबंध से होता है।
A-B-C पेरेंटिंग: एक सरल लेकिन गहरी प्रक्रिया
किताब में पेरेंटिंग को A-B-C के माध्यम से समझाया गया है—जहाँ हर अक्षर माता-पिता और बच्चे के रिश्ते को बेहतर बनाने की दिशा में एक कदम है। यह ढांचा माता-पिता को यह समझने में मदद करता है कि बच्चे के व्यवहार के पीछे क्या भावनाएँ और ज़रूरतें छिपी होती हैं।
यह पुस्तक सिखाती है कि हर परिस्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय, रुककर सोचना और बच्चे के दृष्टिकोण से स्थिति को देखना कितना ज़रूरी है। यही रुकना, यही ठहराव, पेरेंटिंग को बोझ नहीं बल्कि जुड़ाव बना देता है।
टूटे हुए वयस्क नहीं, मजबूत बच्चे
किताब का एक बेहद महत्वपूर्ण संदेश यह है कि “टूटे हुए वयस्कों को सुधारने से बेहतर है, मजबूत बच्चों का निर्माण करना।”
यह विचार पूरी पुस्तक में अलग-अलग उदाहरणों और परिस्थितियों के माध्यम से उभरकर आता है। बच्चों के भावनात्मक विकास, आत्मविश्वास और सुरक्षा की भावना को प्राथमिकता दी गई है। यह किताब यह स्पष्ट करती है कि बच्चों को अनुशासन सिखाना ज़रूरी है, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है उन्हें समझा जाना।
यह माता-पिता को यह एहसास कराती है कि हर बच्चे को सबसे पहले स्वीकार्यता चाहिए—सफलता से पहले।
रोज़मर्रा की पेरेंटिंग के लिए एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका
यह किताब सिर्फ विचारों की बात नहीं करती, बल्कि रोज़मर्रा की पेरेंटिंग में आने वाली उलझनों को छूती है—जैसे गुस्सा, अपराधबोध, तुलना, अपेक्षाएँ और असमंजस।
यह माता-पिता को यह सोचने पर मजबूर करती है कि वे अपने बच्चों के लिए कौन-सी स्क्रिप्ट लिख रहे हैं—डर की या भरोसे की?किताब का उद्देश्य माता-पिता को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि उन्हें सजग बनाना है, ताकि वे अपने बच्चे के साथ एक सुरक्षित और सशक्त रिश्ता बना सकें।
क्यों पढ़ी जानी चाहिए यह पुस्तक
यह पुस्तक उन माता-पिता के लिए है जो:
परफेक्शन के दबाव से बाहर निकलना चाहते हैं
अपने बच्चे को “सुधारने” के बजाय “समझना” चाहते हैं
अपने बचपन के अनुभवों को पहचानकर, अगली पीढ़ी के लिए बेहतर रास्ता बनाना चाहते हैं
यह किताब यह नहीं कहती कि आप गलत कर रहे हैं—यह बस यह पूछती है किक्या इसे थोड़ा और बेहतर तरीके से किया जा सकता है?
अंतिम विचार
यह पुस्तक शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि सोच बदलने की यात्रा है।यह माता-पिता को याद दिलाती है कि पेरेंटिंग कोई भूमिका नहीं, बल्कि एक संबंध है—जो समय, धैर्य और प्रेम से मजबूत होता है।
जो माता-पिता अपने बच्चे के साथ केवल “पालन-पोषण” नहीं, बल्कि एक सच्चा संबंध बनाना चाहते हैं, उनके लिए यह किताब एक आवश्यक पढ़ाई है।



